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मृत्यु एक कल्पना है [Mrutyu Ek Kalpana Hai]

”अपने शरीर से परे प्राणी का आगे बढना, इस बात पर निर्भर नहीं करता कि वह संसार में क्या था, और वह अपने बारे में क्या सोचता था या सब लोग उसके बारे में क्या सोचते थे। यह सिर्फ इस पर निर्भर करता है कि वह कितना जागरूक है, उसने अपने अंदर इस भौतिक शरीर के परे कितना कुछ पैदा किया है।” – सद्गुरु

सद्गुरु हमारे समय के एक दिव्यदर्शी और एक योगी हैं। इनके साथ एक आत्मीय भेंट के दौरान श्रोताओं के एक दल ने अपनी जिज्ञासाओं को ही नहीं, बल्कि अपनी आशंकाओं को भी उनके साथ बाँटा। इन्हीं जिज्ञासाओं को इस पुस्तक में समेटा गया है। पुस्तक के प्रथम खंड में सद्गुरु मृत्यु के संबंध में आदि काल से चली आ रही भीतियों की खोज करते हैं। वे उनका सर्व मर्ज नाशक औषधियों की तरह सांत्वनाप्रद समाधान देने की कोशिश नहीं करते, बल्कि एक ज्ञानी की तथ्यात्मक अंतर्दृष्टि को सामने रखते हैं।

पुस्तक के दूसरे खंड में, वह हमें दुनिया देखने के अपने औपचारिक, परम्परागत नजरिये – हमारे अच्छे और बुरे के ख्याल जिससे दुनिया खंडित हो गई है – को ध्वस्त करने के लिए प्रेरित करते हैं। इसका परिणाम है एक ऐसी पुस्तक जो साधकों के लिए आह्लादकारी है। एक ऐसी पुस्तक जो अनेक महत्वपूर्ण प्रश्नों का सार्थक एवं सटीक उत्तर देती है।

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